विश्व पुस्तक दिवस: डिजिटल युग में किताबों की दुनिया से फिर जुड़ने का संकल्प
बेमेतरा। “किताब पढ़ना हमें एकांत में विचार करने की आदत और सच्ची खुशी देता है।” डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के ये विचार आज के डिजिटल युग में और भी अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। आज जब सूचनाओं का अंबार हमारी उंगलियों पर है, तब किताबों की गहराई और उनसे मिलने वाला सुकून कहीं पीछे छूटता जा रहा है।
विश्व पुस्तक दिवस के अवसर पर आज समाज में पुस्तकों के प्रति प्रेम जगाने और पठन-पाठन की संस्कृति को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। एक दौर था जब किताबें ही मनुष्य की सबसे सच्ची मित्र हुआ करती थीं, लेकिन तकनीक के विस्तार ने शारीरिक किताबों और उनके पन्नों की खुशबू से हमें दूर कर दिया है।
सृजनात्मक जीवन की ओर बढ़ते कदम
पुस्तकों का साथ न केवल हमें ज्ञान देता है, बल्कि एक सृजनात्मक और सार्थक जीवन जीने की प्रेरणा भी देता है। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल स्क्रीन की तुलना में किताबों के साथ बिताया गया समय मानसिक शांति और एकाग्रता को बढ़ाता है। यह हमें गंभीर चिंतन करने और दुनिया को एक नए नजरिए से देखने का अवसर प्रदान करता है।

पुस्तकों को बनाएं अपना सच्चा साथी
विश्व पुस्तक दिवस के इस विशेष अवसर पर आइए हम सब यह संकल्प लें कि:
- प्रतिदिन कम से कम कुछ समय पठन-पाठन के लिए निकालेंगे।
- नई पीढ़ी और बच्चों में कहानियों और महापुरुषों की जीवनी पढ़ने की रुचि जागृत करेंगे।
- डिजिटल शोर से दूर, एकांत में किताबों के साथ ‘सच्ची खुशी’ की तलाश करेंगे।
आज का दिन हमें याद दिलाता है कि तकनीक कितनी भी आगे बढ़ जाए, लेकिन एक अच्छी पुस्तक जो अनुभव और संस्कार देती है, उसका कोई विकल्प नहीं हो सकता। आइए, पुस्तकों को फिर से अपना सच्चा मित्र बनाएं और एक बौद्धिक व समृद्ध समाज के निर्माण में अपनी भागीदारी निभाएं।
