विशेष रिपोर्ट: शक्ति की अधिष्ठात्री माँ बगलामुखी जयंती – स्तंभन और विजय का महापर्व
बेमेतरा : आज देशभर में दशमहाविद्याओं में आठवीं और शत्रु संहारक शक्ति ‘माता बगलामुखी’ की जयंती श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई जा रही है। पीताम्बरा स्वरूप में पूजी जाने वाली देवी बगलामुखी को ब्रह्मांड की स्तंभन शक्ति माना जाता है, जो भक्तों के कष्टों को जड़ करने और शत्रुओं का नाश करने के लिए अवतरित हुई थीं।
ब्रह्मांड के विनाश को रोका: प्राकट्य की कथा
पौराणिक ग्रंथ ‘स्वतंत्र तंत्र’ के अनुसार, सत्ययुग में जब एक भीषण सौर तूफान (विवात चक्र) ने संपूर्ण सृष्टि के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया था, तब भगवान विष्णु ने सौराष्ट्र के हरिद्रा सरोवर (हल्दी की झील) के तट पर कठोर तप किया।
विष्णु जी की तपस्या से प्रसन्न होकर चतुर्दशी की रात्रि को महाशक्ति श्री विद्या के हृदय से एक दिव्य तेज प्रकट हुआ, जिसने ‘बगलामुखी’ का स्वरूप धारण किया। देवी ने अपनी अलौकिक स्तंभन शक्ति से उस विनाशकारी तूफान को स्थिर कर दिया और चराचर जगत की रक्षा की।
शत्रु की जिह्वा का स्तंभन: मदन वध का प्रसंग
एक अन्य प्रसंग के अनुसार, मदन नामक असुर ने अपनी वाक-सिद्धि का दुरुपयोग कर देवताओं को त्रस्त कर दिया था। तब माँ बगलामुखी ने:
- असुर की जीभ को पकड़कर उसकी वाणी को स्तंभित कर दिया।
- अपनी गदा से उसका वध कर अज्ञानता का अंत किया। यही कारण है कि माता के चित्रों में उन्हें शत्रु की जीभ खींचते हुए दिखाया जाता है, जो बाहरी और आंतरिक (कुविचार) दोनों शत्रुओं पर नियंत्रण का प्रतीक है।
स्वरूप का आध्यात्मिक महत्व
देवी बगलामुखी का स्वरूप केवल भय नहीं, बल्कि विजय और शुद्धि का संदेश देता है:
कैसे मनाएं जयंती?
आज के दिन भक्त पीले वस्त्र धारण कर, हल्दी की माला से माता के मंत्रों का जाप करते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, आज के दिन माँ बगलामुखी की आराधना करने से मुकदमों में विजय, शत्रुओं का पराभव और जीवन की बाधाओं का स्तंभन होता है।
“ॐ ह्लीं बगलामुखि सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा।”
ब्यूरो रिपोर्ट: आध्यात्मिक डेस्क
