Social menu is not set. You need to create menu and assign it to Social Menu on Menu Settings.

24/04/2026

​.​कानपुर: कचहरी की पांचवीं मंजिल से कूदकर युवा वकील ने दी जान.’पापा मेरे शव को हाथ न लगाएं’: कड़वी यादों और पारिवारिक तनाव ने ली एक युवा की जान

​कानपुर कचहरी (कोर्ट परिसर) में एक युवा वकील, प्रियांशु श्रीवास्तव ने कोर्ट की बहुमंजिला इमारत की पांचवीं मंजिल से कूदकर अपनी जान दे दी। यह घटना समाज और परिवार के बीच गिरते संवाद के स्तर का एक दर्दनाक उदाहरण बनकर सामने आई है।

घटना का विवरण:

  • स्थान: कानपुर कोर्ट परिसर, उत्तर प्रदेश।
  • मृतक: प्रियांशु श्रीवास्तव (23 वर्षीय वकील)।
  • वजह: प्रियांशु ने अपने सुसाइड नोट में पिता के साथ चल रहे तनावपूर्ण संबंधों और मानसिक प्रताड़ना का जिक्र किया था।
  • सुसाइड नोट के मार्मिक शब्द: प्रियांशु ने लिखा था, “पापा आपको जीत मुबारक, मैं हार गया। आप मेरे शव को हाथ मत लगाना।” उसने यह भी उल्लेख किया कि उसके पिता के सख्त व्यवहार और अपमान ने उसे इस कदर तोड़ दिया था कि उसे मौत अधिक आसान लगी।

    ​बेमेतरा/कानपुर: एक उभरते हुए युवा की जिंदगी का चिराग उस वक्त बुझ गया जब उसने मानसिक हताशा और पारिवारिक अपमान से तंग आकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इस मामले में मृतक प्रियांशु के आखिरी शब्द किसी की भी रूह कंपा देने वाले हैं। उसने अपनी वसीयत या सुसाइड नोट में स्पष्ट रूप से लिखा— “पापा मेरे शव को हाथ न लगाएं।”

    घटना का सारांश

    ​प्राप्त जानकारी के अनुसार, प्रियांशु और उसके पिता के बीच लंबे समय से अनबन और वैचारिक मतभेद चल रहे थे। बताया जा रहा है कि पारिवारिक अपमान और कड़वी यादों के बोझ तले प्रियांशु इस कदर दबा हुआ था कि उसने इस आत्मघाती कदम को चुनना बेहतर समझा। चित्र में दिख रही बहुमंजिला इमारत और प्रियांशु की गंभीर छवि उसके भीतर चल रहे संघर्ष की एक मौन गवाही है।

    विशेषज्ञों का नजरिया: “जब बेटे के पैर में पिता का जूता आने लगे”

    ​शास्त्रों और सामाजिक मनोविज्ञान में कहा गया है कि जब बेटा बड़ा हो जाए और पिता का जूता उसके पैरों में आने लगे, तो वह पुत्र नहीं, मित्र बन जाता है। प्रियांशु के मामले ने समाज को फिर से इस पुरानी सीख की याद दिलाई है।

    • बदलता दौर, बदलती सोच: आज के दौर में युवाओं पर करियर, समाज और परिवार का भारी दबाव है। ऐसे में माता-पिता को अनुशासन और मित्रता के बीच एक संतुलित व्यवहार रखने की आवश्यकता है।
    • दबाव का परिणाम: विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संतान में कोई अवगुण भी हो, तो उसे सुधारने के तरीके अपमानजनक नहीं होने चाहिए। अत्यधिक दबाव अक्सर संवाद की जगह दूरियां बढ़ा देता है।

    माता-पिता के लिए एक बड़ी सीख

    ​यह दुखद घटना उन सभी अभिभावकों के लिए एक चेतावनी है जो अपनी अपेक्षाओं का बोझ बच्चों पर लाद देते हैं।

    ​”बच्चा बालिग होने के बाद अपनी राह चुनने के लिए स्वतंत्र है। समय और परिस्थितियाँ उसे खुद सिखाती हैं। यदि संवाद कड़वाहट में बदल जाए, तो खुद को थोड़ा सीमित कर लेना ही श्रेयस्कर है, ताकि किसी प्रियांशु को अपनी जान न गंवानी पड़े।”

    निष्कर्ष:प्रियांशु की मौत केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं, बल्कि संवाद की विफलता का प्रतीक है। समाज को सोचना होगा कि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को कैसा परिवेश दे रहे हैं—सहयोग का या असहनीय दबाव का?

    यदि आप या आपका कोई जानने वाला किसी भी प्रकार के मानसिक तनाव से गुजर रहा है, तो कृपया किसी पेशेवर काउंसलर या हेल्पलाइन से संपर्क करें। जीवन अमूल्य है।

About The Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *