असम की शेरनी: जब क्रांतिकारी कमलादेवी हजारिका ने चर्च के पादरी को सिखाया ‘धर्मांतरण’ का पाठ
यह कहानी असम की उन महान वीरांगनाओं और सांस्कृतिक रक्षकों की याद दिलाती है, जिन्होंने औपनिवेशिक काल के दौरान न केवल अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया, बल्कि अपनी जड़ों और धर्म की भी रक्षा की।
बेमेतरा: इतिहास के पन्नों में कई ऐसी गाथाएं दबी हुई हैं, जो हमें बताती हैं कि भारतीय संस्कृति की नींव कितनी गहरी है। ऐसी ही एक साहसी महिला थीं असम की सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी कमलादेवी हजारिका। यह कहानी उनके उस अडिग विश्वास और हाजिरजवाबी की है, जिसने एक विदेशी मिशनरी के अहंकार को धूल चटा दी थी।
मिशनरी का ‘षड्यंत्र’ और दादी का ‘धैर्य’
औपनिवेशिक काल के दौरान, असम के एक प्रभावशाली परिवार में फादर क्रूज नामक एक मिशनरी को बालक को अंग्रेजी पढ़ाने का काम सौंपा गया। पादरी का मुख्य उद्देश्य शिक्षा देना नहीं, बल्कि उस प्रभावशाली परिवार के माध्यम से पूरे गांव का धर्मांतरण करना था।
पादरी ने भांप लिया था कि घर की धुरी ‘दादी’ (कमलादेवी हजारिका) हैं। उसने दादी को ईसा मसीह के चमत्कारों की कहानियां सुनानी शुरू कीं—कैसे उन्होंने बीमारों को ठीक किया और नेत्रहीनों को रोशनी दी।
सनातन की शक्ति का परिचय
जब पादरी अपने चमत्कारों का बखान कर रहा था, तब कमलादेवी हजारिका ने अत्यंत सहजता से उत्तर दिया:
”बेटा, हमारे राम और कृष्ण के चमत्कारों के आगे ये कुछ भी नहीं हैं। क्या तुमने सुना है कि राम के स्पर्श से पत्थर ‘अहिल्या’ बन गया? क्या तुम्हें पता है कि उनके नाम मात्र से पत्थर समुद्र पर तैरने लगे थे?”
उनके इस तर्क ने पादरी को निरुत्तर तो किया, लेकिन उसके कुत्सित प्रयास थमे नहीं।
केक का टुकड़ा और पादरी का अट्टहास
एक दिन पादरी चर्च से ‘केक’ लेकर आया और दादी को खाने को दिया। उसे लगा कि यदि दादी ने यह केक खा लिया, तो वह उसे अपवित्र घोषित कर ईसाई धर्म में शामिल होने का दबाव बना सकेगा। दादी ने निडर होकर वह केक खा लिया।
जैसे ही केक खत्म हुआ, पादरी गर्व से चिल्लाया— “माताजी! अब आप ईसाई हो गई हैं क्योंकि आपने चर्च का प्रसाद खा लिया है!”
वो ऐतिहासिक जवाब: “तू हिंदू क्यों नहीं हुआ?”
कमलादेवी हजारिका ने जो जवाब दिया, वह आज भी हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है। उन्होंने पादरी का कान खींचते हुए बड़े प्रेम लेकिन दृढ़ता से कहा:
“वाह रे गधे! मुझे एक दिन केक खिलाया तो मैं ईसाई हो गई? और मैं प्रतिदिन तुझे अपने घर का भोजन खिलाती हूँ, तो तू हिंदू क्यों नहीं हुआ रे नमक हराम? तू तो प्रतिदिन इस सनातन भूमि का जल पीता है, यहाँ की वायु में सांस लेता है… फिर तो तेरा रोम-रोम हिंदू बन जाना चाहिए!”
विरासत: क्यों जानना जरूरी है कमलादेवी हजारिका को?
कमलादेवी हजारिका मात्र एक दादी माँ नहीं थीं; वह असम की एक प्रखर क्रांतिकारी और राष्ट्रवादी महिला थीं। उन्होंने सिखाया कि धर्म और संस्कृति केवल खान-पान से नहीं बदलती, बल्कि वह आत्मा का अटूट हिस्सा होती है।
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- सांस्कृतिक राष्ट्रवाद: उन्होंने दिखाया कि बिना शस्त्र उठाए भी वैचारिक युद्ध कैसे जीता जाता है।
- असम का गौरव: असम से बाहर बहुत कम लोग उनके योगदान को जानते हैं, लेकिन उनका जीवन स्वधर्म की रक्षा के लिए एक मिसाल है।
आज जब समाज फिर से अपनी जड़ों की ओर लौट रहा है, तब कमलादेवी हजारिका जैसी विभूतियों की गाथाएं नई पीढ़ी को यह सिखाती हैं कि अपनी संस्कृति पर गर्व करना ही सबसे बड़ी शक्ति है।
सांस्कृतिक गौरव की इस कहानी को साझा करें ताकि देश अपनी इस गुमनाम वीरांगना को पहचान सके।
