अनोखा विरोध: जब एनओसी के लिए किसान ने बैंक में बजवा दिए ढोल-नगाड़े
धार (मध्य प्रदेश): अक्सर कहा जाता है कि सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते चप्पलें घिस जाती हैं, लेकिन मध्य प्रदेश के धार जिले में एक किसान ने सिस्टम को जगाने के लिए चप्पलें घिसने के बजाय ‘पैर थिरकाना’ बेहतर समझा। पिछले 6 महीनों से अपनी एनओसी (No Objection Certificate) के लिए परेशान एक किसान ने जब देखा कि गुहार काम नहीं आ रही, तो उसने बैंक के भीतर ही ढोल-नगाड़ों के साथ जमकर डांस किया।
क्या है पूरा मामला?
धार जिले के रहने वाले एक किसान ने स्थानीय बैंक से कृषि ऋण (Loan) लिया था। किसान का दावा है कि उसने समय रहते बैंक का पूरा कर्ज चुकता कर दिया था। नियमानुसार, कर्ज भरने के बाद बैंक को ‘नो ड्यूज सर्टिफिकेट’ या एनओसी जारी कर देनी चाहिए, ताकि किसान की जमीन कागजी तौर पर कर्ज मुक्त हो सके।
- परेशानी: किसान पिछले 6 महीनों से हर दिन बैंक के चक्कर लगा रहा था।
- बहाना: बैंक प्रबंधन कभी सर्वर डाउन होने, कभी बाबू के न होने तो कभी अन्य तकनीकी कारणों का हवाला देकर उसे टाल रहा था।
विरोध का ‘म्यूजिकल’ तरीका
शनिवार को किसान अकेले बैंक नहीं पहुँचा, बल्कि अपने साथ ढोल-नगाड़े बजाने वाली टोली लेकर पहुँचा। जैसे ही ढोल की थाप गूँजी, बैंक के कर्मचारी और वहां मौजूद ग्राहक हैरान रह गए। किसान ने बैंक के भीतर ही नाचना शुरू कर दिया। उसका कहना था कि शांति से बात करने पर साहब को सुनाई नहीं दे रहा, शायद शोर और संगीत से उनकी ‘याददाश्त’ वापस आ जाए।
डांस का जादू: मिनटों में मिली एनओसी
दिलचस्प बात यह रही कि जो काम पिछले 180 दिनों में नहीं हो पाया, वह चंद मिनटों के डांस के बाद हो गया।
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- बैंक में अफरा-तफरी मचते देख और मामला बढ़ता देख मैनेजर तुरंत केबिन से बाहर आए।
- वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के डर और सार्वजनिक फजीहत से बचने के लिए कागजी कार्रवाई तुरंत शुरू की गई।
- रिपोर्ट्स के अनुसार, किसान को तत्काल एनओसी (NOC) थमा दी गई।
“जब घी सीधी उंगली से न निकले, तो उंगली टेढ़ी करनी पड़ती है। मैंने कर्ज चुका दिया था, फिर भी मुझे भिखारी की तरह दौड़ाया जा रहा था। संगीत ने वो काम कर दिया जो मेरी प्रार्थना नहीं कर पाई।” — पीड़ित किसान
छत्तीसगढ़ की घटना से तुलना
हाल ही में छत्तीसगढ़ में भी एक ऐसा ही मामला सामने आया था जहाँ काम न होने से नाराज एक व्यक्ति ने अधिकारियों को बादाम खिलाए थे ताकि उन्हें उनका वादा याद आ जाए। अब धार की इस घटना ने यह साबित कर दिया है कि भ्रष्टाचार और लेटलतीफी के खिलाफ जनता अब गांधीवादी तरीके के साथ-साथ ‘क्रिएटिव’ विरोध का रास्ता अपना रही है।
निष्कर्ष: यह घटना बैंक प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है कि आखिर एक साधारण से सर्टिफिकेट के लिए किसी अन्नदाता को इस हद तक मजबूर क्यों होना पड़ा? फिलहाल, किसान की खुशी और उसके डांस का वीडियो इंटरनेट पर चर्चा का विषय बना हुआ है।
