विशेष रिपोर्ट: चकाचौंध के शोर में कहीं खो गई गाँवों की वो सादगी और ‘असली भारत’ की रौनक
बेमेतरा/ग्रामीण भारत: आज के दौर में जब विवाह समारोह ‘डेस्टिनेशन वेडिंग’ और ‘इवेंट मैनेजमेंट’ के भारी-भरकम शोर में तब्दील हो चुके हैं, तब ग्रामीण अंचलों से आती ऐसी तस्वीरें दिल को सुकून देती हैं। सोशल मीडिया पर वायरल हो रही एक ग्रामीण कन्या की तस्वीर ने एक बार फिर उस बहस को छेड़ दिया है कि क्या हम आधुनिकता की दौड़ में अपनी जड़ों को भूलते जा रहे हैं?
सादगी ही जहाँ श्रृंगार है
तस्वीर में दिख रही यह नन्ही बच्ची ग्रामीण भारत की उस शुद्धता का प्रतीक है, जो बिना किसी कृत्रिमता के भी अलौकिक लगती है। जहाँ आज शहरों में ‘ब्राइडल मेकअप’ और भारी-भरकम ‘अढ़ाई सेर’ के प्रसाधनों का चलन है, वहीं इस बच्ची के चेहरे की मासूमियत और सहजता यह साबित करती है कि असली सुंदरता भीतर से आती है, न कि रसायनों के लेप से।
गुम होते ठेठ ग्रामीण रीति-रिवाज
ग्रामीण विवाहों की पहचान कभी उनके पारंपरिक गीतों (बन्ना-बन्नी), मिट्टी की खुशबू वाले पकवानों और ‘पनघट’ की रस्मों से होती थी। लेकिन अब:
- डीजे के शोर में: लोकगीतों की मधुरता दब गई है।
- दिखावे की संस्कृति: ने आपसी भाईचारे और सादगी वाले मिलन की जगह ले ली है।
- पहनावा: धोती, साफा और पारंपरिक घाघरा-ओढ़नी की जगह अब ब्रांडेड लेकिन बेजान कपड़ों ने ले ली है।
विरासत को सहेजने की पुकार
यह तस्वीर हमें याद दिलाती है कि ‘असली भारत’ अभी भी उन धूल भरी पगडंडियों और सादे आँगनों में जीवित है। इस बच्ची की मुस्कान उस परंपरा की मशाल है, जिसे संजोना हम सभी का दायित्व है।
संपादकीय टिप्पणी: > “ईश्वर इस बिटिया को सौभाग्य प्रदान करें और हमारे समाज को यह सद्बुद्धि कि हम अपनी जड़ों की सादगी को आधुनिकता की वेदी पर कुर्बान न करें।”
ऐसी सादगी अब दुर्लभ होती जा रही है, पर यही तो हमारे भारत की असल पहचान है।
