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18/04/2026

भगवान परशुराम: शस्त्र और शास्त्र के अद्भुत समन्वय, युगों-युगों तक अमर रहने वाले महानायक

​सनातन धर्म में भगवान विष्णु के दस मुख्य अवतारों का वर्णन मिलता है, जिनमें छठा अवतार भगवान परशुराम का है। परशुराम जी केवल एक पौराणिक चरित्र नहीं, बल्कि वे शक्ति, न्याय और ज्ञान के उस शिखर का प्रतीक हैं, जहाँ शस्त्र और शास्त्र का मिलन होता है। उन्हें ‘अक्षय’ माना जाता है क्योंकि वे सप्त चिरंजीवियों में से एक हैं, जो आज भी पृथ्वी पर विद्यमान माने जाते हैं।

जन्म और कुल परंपरा

​भगवान परशुराम का जन्म वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हुआ था, जिसे हम आज अक्षय तृतीया के रूप में मनाते हैं।

  • पिता: सप्तऋषियों में से एक महर्षि जमदग्नि।
  • माता: राजा प्रसेनजित की पुत्री माता रेणुका।
  • वंश: वे भृगु ऋषि के कुल में जन्मे थे, इसलिए उन्हें ‘भार्गव’ भी कहा जाता है।

​उनका मूल नाम राम था, लेकिन भगवान शिव की कठोर तपस्या के बाद जब शिव ने उन्हें अपना दिव्य अस्त्र ‘परशु’ (फरसा) भेंट किया, तब से उनका नाम ‘परशुराम’ पड़ा।

अन्याय के विरुद्ध 21 बार पृथ्वी का शुद्धिकरण

​परशुराम जी के जीवन की सबसे चर्चित घटना है उनका क्षत्रियों के विरुद्ध अभियान। यह कोई जातिगत संघर्ष नहीं, बल्कि अधर्म के विरुद्ध युद्ध था।

​तत्कालीन समय में हैहय वंश का राजा सहस्रार्जुन अपनी शक्तियों के मद में चूर होकर ऋषियों और निर्दोषों पर अत्याचार कर रहा था। उसने महर्षि जमदग्नि की कामधेनु गाय का बलपूर्वक अपहरण किया और अंततः महर्षि की हत्या कर दी। पिता के अपमान और हत्या का प्रतिशोध लेने के लिए परशुराम ने शस्त्र उठाया।

​उन्होंने न केवल सहस्रार्जुन का वध किया, बल्कि पृथ्वी को अत्याचारी और मदोन्मत्त राजाओं से मुक्त करने के लिए 21 बार अभियान चलाया। अंत में, उन्होंने जीती हुई समस्त भूमि महर्षि कश्यप को दान कर दी और स्वयं महेंद्र पर्वत पर तपस्या करने चले गए।

 

शस्त्र और शास्त्र के ज्ञाता

​परशुराम जी का व्यक्तित्व दो परस्पर विरोधी गुणों का अद्भुत मिश्रण है:

  1. ब्राह्मणोचित ज्ञान: वे वेदों के पूर्ण ज्ञाता और महान तपस्वी थे।
  2. क्षत्रियोचित शौर्य: वे युद्धकला और अस्त्र-शस्त्र संचालन (विशेषकर धनुर्विद्या और परशु) में अद्वितीय थे।

​माना जाता है कि केरल की प्रसिद्ध युद्धकला ‘कलारीपयट्टू’ की नींव भी भगवान परशुराम ने ही रखी थी।

तीन युगों के साक्षी (चिरंजीवी)

​परशुराम जी को ‘कालजयी’ माना जाता है क्योंकि उनका वर्णन रामायण और महाभारत दोनों काल में मिलता है:

काल/युग

प्रसंग

त्रेता युग

सीता स्वयंवर में शिव धनुष टूटने पर लक्ष्मण के साथ उनका संवाद प्रसिद्ध है।

द्वापर युग

वे भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य और कर्ण जैसे महान योद्धाओं के गुरु रहे।

माना जाता है कि वे कल्कि अवतार (विष्णु का १०वां अवतार) को अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा देंगे।

आज के समय में प्रासंगिकता

​भगवान परशुराम का जीवन हमें सिखाता है कि शक्ति का उपयोग सदैव न्याय की रक्षा के लिए होना चाहिए। वे उस समाज की कल्पना करते थे जहाँ कोई भी शक्तिशाली व्यक्ति निर्बल का शोषण न करे। उनके जीवन का दर्शन है— “अग्रत: चतुरो वेदा: पृष्ठत: सशरं धनु:” (आगे चारों वेद और पीछे बाणों से भरा धनुष), अर्थात ज्ञान और शक्ति का संतुलन ही समाज की रक्षा कर सकता है।

​अक्षय तृतीया के दिन जन्मे भगवान परशुराम मानवता के रक्षक और न्याय के पुरोधा हैं। उनका चरित्र हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहने, ज्ञान अर्जित करने और अन्याय के सामने न झुकने की प्रेरणा देता है। वे आज भी महेंद्र पर्वत पर तपस्यालीन होकर धर्म की रक्षा कर रहे हैं।

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