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04/05/2026

​संपादकीय: बंगाल की बदलती करवट और हिन्दुओं की सामाजिक एकजुटता का संदेश

​पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से वैचारिक संघर्ष और जमीनी आंदोलनों का अखाड़ा रही है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में राज्य के सामाजिक ताने-बाने में एक नया और स्पष्ट बदलाव देखने को मिला है। हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों और सार्वजनिक विमर्श को देखें, तो यह बहस तेज हो गई है कि क्या बंगाल में एक विशेष प्रकार की ‘तुष्टिकरण की राजनीति’ का सूर्यास्त हो रहा है? और क्या इसके पीछे हिंदू समाज की बढ़ती एकजुटता एक निर्णायक कारक बनकर उभरी है?

तुष्टिकरण बनाम ध्रुवीकरण

​बंगाल में लंबे समय से विपक्षी दलों द्वारा सत्ताधारी दल पर ‘एम’ (विशेष समुदाय) फैक्टर पर आधारित राजनीति करने के आरोप लगते रहे हैं। आलोचकों का तर्क है कि सत्ता की बागडोर सुरक्षित रखने के लिए एक विशिष्ट वोट बैंक को प्राथमिकता दी गई, जिससे बहुसंख्यक समाज के एक बड़े वर्ग में असुरक्षा और उपेक्षा की भावना पैदा हुई। इस ‘सल्तनत’ जैसी कार्यशैली ने अंततः उस प्रतिक्रिया को जन्म दिया, जिसे आज हम व्यापक सामाजिक गोलबंदी के रूप में देख रहे हैं।

एकजुटता के सूत्र

​हिंदू समाज की इस कथित एकजुटता के पीछे केवल धार्मिक कारण नहीं, बल्कि कई सामाजिक और सुरक्षा संबंधी चिंताएं भी हैं:

  • सांस्कृतिक पहचान का संरक्षण: दुर्गा पूजा और अन्य लोक उत्सवों को लेकर होने वाले प्रशासनिक विवादों ने लोगों को अपनी पहचान के प्रति अधिक जागरूक बनाया है।
  • कानून व्यवस्था और निष्पक्षता: संदेशखाली जैसी घटनाओं ने जनता के मन में यह सवाल खड़ा किया कि क्या राज्य का तंत्र सभी के लिए समान रूप से कार्य कर रहा है?
  • मतदान का बदला मिजाज: जातीय और क्षेत्रीय पहचान से ऊपर उठकर एक व्यापक पहचान के साथ मतदान करने की प्रवृत्ति ने दशकों पुराने राजनीतिक समीकरणों को ध्वस्त कर दिया है।

क्या यह एक स्थायी बदलाव है?

​किसी भी लोकतंत्र में जब एक बड़ा वर्ग खुद को हाशिए पर महसूस करता है, तो वह ‘सामूहिक शक्ति’ के रूप में उभरता है। बंगाल में जिसे ‘सल्तनत का अंत’ कहा जा रहा है, वह वास्तव में सत्ता के उस अहंकार को चुनौती है जो जनसांख्यिकीय संतुलन और वोट बैंक की गणनाओं पर टिका था।

राजनीति में कोई भी ‘किला’ अभेद्य नहीं होता। बंगाल की जनता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि शासन का आधार समावेशी विकास और सांस्कृतिक सम्मान होना चाहिए, न कि किसी विशेष समूह का वर्चस्व। यदि हिंदू समाज की यह एकजुटता न्याय और समानता की मांग पर आधारित है, तो यह राज्य के भविष्य के लिए एक नई लोकतांत्रिक दिशा का संकेत है।

एक विमर्श: क्या आपको लगता है कि यह एकजुटता केवल चुनावों तक सीमित है, या यह बंगाल के सामाजिक ढांचे में एक स्थायी बदलाव ला रही है?

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