होर्मुज संकट के बीच भारत का ‘मास्टरस्ट्रोक’: चेन्नई-व्लादिवोस्तोक गलियारा बनेगा नई लाइफलाइन
नई दिल्ली: वैश्विक मंच पर जब भी मध्य पूर्व (Middle East) में तनाव बढ़ता है, पूरी दुनिया की सांसें थम जाती हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की नाकाबंदी का डर हमेशा तेल संकट की आहट लेकर आता है। लेकिन भारत ने अब अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए किसी एक रास्ते पर निर्भर रहना छोड़ दिया है। भारत और रूस के बीच शुरू हुआ चेन्नई-व्लादिवोस्तोक पूर्वी समुद्री गलियारा (EMC) भविष्य की वैश्विक राजनीति में एक ‘गेम चेंजर’ साबित होने जा रहा है।
रणनीतिक बैकअप: अब नहीं रुकेगी तेल की रफ्तार
वर्तमान में मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच, भारत ने रूस के साथ मिलकर एक ऐसा वैकल्पिक मार्ग तैयार कर लिया है जो मलक्का या होर्मुज जैसे संवेदनशील जलडमरूमध्यों पर भारत की निर्भरता को न्यूनतम कर देगा। 10,000 किलोमीटर लंबा यह महत्वाकांक्षी समुद्री मार्ग अब पूरी तरह परिचालन में आ चुका है।
क्यों खास है यह गलियारा?
- समय और लागत की भारी बचत: पारंपरिक स्वेज नहर मार्ग के मुकाबले इस रास्ते से माल पहुँचने में लगने वाला समय लगभग 35-40% तक कम हो जाएगा।
- ऊर्जा सुरक्षा: रूस से सीधे कच्चा तेल, एलएनजी, कोयला और महत्वपूर्ण धातुएं बिना किसी तीसरे देश के हस्तक्षेप के भारत पहुँच सकेंगी।
- निर्बाध व्यापार: 2019 में प्रधानमंत्री मोदी की व्लादिवोस्तोक यात्रा के दौरान शुरू हुई यह परियोजना 2024 से धरातल पर पूरी मजबूती से उतर चुकी है।
- चीन के प्रभाव को चुनौती: यह मार्ग दक्षिण चीन सागर के विवादित रास्तों से हटकर एक सुरक्षित विकल्प प्रदान करता है।
भविष्य की तैयारी: एक नहीं, अनेक रास्ते
भारत की नई विदेश और व्यापार नीति अब “सिंगल रूट” के भरोसे नहीं है। सरकार का लक्ष्य व्यापारिक मार्गों का एक ऐसा नेटवर्क बनाना है जो किसी भी युद्ध या तनाव की स्थिति में देश की अर्थव्यवस्था को रुकने न दे।
चेन्नई-व्लादिवोस्तोक गलियारा सिर्फ व्यापार का रास्ता नहीं है, बल्कि यह आत्मनिर्भर भारत की उस दूरगामी सोच का परिणाम है, जहाँ ऊर्जा की सुरक्षा सीमाओं के पार भी सुरक्षित है।
ब्यूरो रिपोर्ट, आर. जनमत
