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19/04/2026

​भक्ति और बलिदान की अमर गाथा: श्रीरंगम का वह ‘सफेद गोपुरम’ और नर्तकी वेल्लयी का सर्वोच्च त्याग

यह कहानी इतिहास के उन पन्नों से है जहाँ भक्ति, कला और बलिदान का एक अद्भुत संगम देखने को मिलता है। श्रीरंगम मंदिर के ‘वेल्लई गोपुरम’ (सफेद मीनार) की चमक के पीछे एक ऐसी वीरांगना की गाथा छिपी है, जिसने भगवान की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दिया विस्तृत रिपोर्ट

श्रीरंगम: भारतीय इतिहास में 14वीं शताब्दी का समय उथल-पुथल से भरा था, लेकिन इसी दौर में श्रीरंगम की धरती पर एक ऐसी घटना घटी जिसने वीरता की परिभाषा बदल दी। यह कहानी है 1323 ई. की, जब दिल्ली सल्तनत की सेनाओं ने दक्षिण भारत के सबसे पवित्र स्थलों में से एक, श्रीरंगम मंदिर पर आक्रमण किया।

12,000 बलिदानियों का रक्त और लुटा हुआ वैभव

​तमिल महीने वैकासी के दौरान, सल्तनत की विशाल सेना ने श्रीरंगम द्वीप पर धावा बोल दिया। इतिहास बताता है कि मंदिर की रक्षा करते हुए लगभग 12,000 निवासियों (जिन्हें ‘पन्निरुयिरम’ कहा जाता है) ने अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। सेना ने मंदिर के वैभव को तहस-नहस कर दिया और भगवान रंगनाथ के बहुमूल्य गहने और सोना लूट लिया।

मूर्ति की रक्षा और पिल्लैलोकाचार्य का पलायन

​आक्रमणकारियों का मुख्य लक्ष्य भगवान विष्णु की उत्सव मूर्ति, ‘नम्पेरुमल’ को जब्त करना था। हालांकि, वैष्णव आचार्य पिल्लैलोकाचार्य की सूझबूझ से मूर्ति को पहले ही सुरक्षित निकाल लिया गया था। वे मूर्ति को लेकर मदुरै की ओर निकल पड़े। यह वही मूर्ति थी जो 1323 में मंदिर से दूर हुई और पूरे 48 वर्षों बाद 1371 में वापस लौट सकी।

नर्तकी वेल्लयी: एक ‘दिव्य’ कूटनीति

​जब सल्तनत की सेना को मूर्ति नहीं मिली, तो उन्होंने मंदिर के अधिकारियों को मारना और आचार्य का पीछा करना शुरू किया। उस नाजुक घड़ी में, मंदिर की नर्तकी (देवदासी) वेल्लयी ने एक साहसिक निर्णय लिया। आचार्य और मूर्ति को दूर जाने के लिए समय चाहिए था, और वेल्लयी ने अपनी कला को हथियार बनाया।

​उसने सेना के कमांडर के सामने नृत्य करना शुरू किया। अपने मोहक नृत्य और कला के प्रदर्शन से उसने कमांडर को घंटों तक उलझाए रखा। जैसे-जैसे समय बीतता गया, आचार्य पिल्लैलोकाचार्य सुरक्षित दूरी तक पहुँच गए।

अंतिम प्रहार और सर्वोच्च बलिदान

​नृत्य के अंत में, वेल्लयी उस कमांडर को मंदिर के पूर्वी गोपुरम (मीनार) की ऊंचाई पर ले गई। अवसर पाकर उसने कमांडर को ऊपर से नीचे धकेल दिया, जिससे उसकी मृत्यु हो गई। शत्रु का अंत करने के पश्चात, अपनी पवित्रता और निष्ठा को बनाए रखने के लिए, वेल्लयी ने स्वयं भी ‘रंगनाथर’ का नाम जपते हुए उसी गोपुरम से छलांग लगा दी।

विजयनगर साम्राज्य का सम्मान और आज की पहचान

​वर्षों बाद, जब विजयनगर साम्राज्य के सेनापति केम्पन्ना ने सल्तनत की सेनाओं को परास्त कर श्रीरंगम को मुक्त कराया, तो उन्होंने वेल्लयी के इस अदभुत बलिदान की गाथा सुनी। उनके सम्मान में:

  • ​उस पूर्वी गोपुरम का नाम ‘वेल्लई गोपुरम’ रखा गया।
  • ​परंपरा के अनुसार, इस गोपुरम को आज भी सफेद रंग से रंगा जाता है (जबकि अन्य गोपुरम रंगीन होते हैं)।

​आज भी श्रीरंगम मंदिर का यह सफेद गोपुरम हमें याद दिलाता है कि आस्था की रक्षा केवल तलवारों से नहीं, बल्कि नृत्य, कला और अटूट संकल्प से भी की जा सकती है।

“इतिहास गवाह है कि जब-जब धर्म पर संकट आया, वेल्लयी जैसी आत्माओं ने अपने रक्त से गौरव की नई इबारत लिखी।”

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