विशेष रिपोर्ट: ईरान का ‘पाताल लोक’—क्यों अमेरिका और इजराइल की बमबारी भी रही बेअसर?
तेहरान/वॉशिंगटन: पिछले 40 दिनों से जारी भीषण तनाव और बमबारी के बीच दुनिया एक ही सवाल पूछ रही है—हजारों टन बारूद और अमेरिका के सबसे घातक ‘बंकर बस्टर’ (GBU-57) बमों के बावजूद ईरान की मिसाइलें आसमान क्यों फाड़ रही हैं? इसका उत्तर किसी जादुई शक्ति में नहीं, बल्कि ईरान के 500 मीटर गहरे ‘ग्रेनाइट किलों’ में छिपा है।
1. ग्रेनाइट की ढाल: जहाँ विज्ञान भी हार मान गया
ईरान ने अपने ‘मिसाइल शहरों’ को शिरकूह और यज़्द जैसे पहाड़ों के नीचे 240 से 500 मीटर की गहराई में बसाया है। अमेरिकी एयरफोर्स का सबसे शक्तिशाली बम, GBU-57, जो कंक्रीट की मोटी परतों को चीरने के लिए बनाया गया है, वह भी ग्रेनाइट की इन चट्टानों में केवल 30-60 मीटर तक ही धँस पाता है। इसके नीचे मौजूद ईरान का मिसाइल तंत्र पूरी तरह सुरक्षित और ‘अछूता’ रहता है।
2. ‘स्मार्ट साइलो’ और रेल नेटवर्क का जाल
ईरान के ये ठिकाने केवल गोदाम नहीं हैं। यहाँ का सिस्टम पूरी तरह से ‘कंपार्टमेंटलाइज्ड’ (अलग-अलग हिस्सों में बँटा) है:
- मेट्रो जैसा रेल सिस्टम: सुरंगों के भीतर ट्रेनें मिसाइल के हिस्सों को स्टोरेज से लॉन्चिंग पॉइंट तक ले जाती हैं।
- फाइबर ऑप्टिक कमांड: ये बेस सैटेलाइट पर निर्भर नहीं हैं, जिससे इन्हें जैम करना असंभव है।
- हाइड्रॉलिक लॉन्च: 15 मिनट के भीतर ‘साल्वो मोड’ में एक साथ कई मिसाइलें दागी जा सकती हैं, जिससे दुश्मन को संभलने का मौका नहीं मिलता।
3. सद्दाम से सीखा 40 साल पुराना सबक
यह तकनीक रातों-रात पैदा नहीं हुई। 1980 के दशक में ईरान-इराक युद्ध के दौरान, जब सद्दाम हुसैन ने अमेरिकी मदद से ईरान के खुले ठिकानों को तबाह कर दिया था, तब ईरान ने ‘सेकंड-स्ट्राइक कैपेबिलिटी’ का महत्व समझा। 1984 में उत्तर कोरिया की मदद से पहली सुरंग खोदने से शुरू हुआ यह सफर आज 30 से अधिक सक्रिय ‘मिसाइल सिटीज़’ तक पहुँच चुका है।
4. क्या भारत के लिए यह एक चेतावनी है?
लेखक मनोज कुमार मिश्रा के अनुसार, ईरान का यह मॉडल साबित करता है कि ‘एयर सुपीरियॉरिटी’ (हवाई प्रभुत्व) ही युद्ध जीतने की गारंटी नहीं है। यदि इरादे और इंफ्रास्ट्रक्चर ग्रेनाइट जैसे मजबूत हों, तो दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति को भी छकाया जा सकता है।
“दिमाग हिला देने वाली यह तकनीक भारत के लिए भी एक बड़ा सबक है। क्या हमें भी अपनी सीमाओं पर दुश्मनों के सैन्य ढांचे पर पैनी नजर रखते हुए ऐसे ही अभेद्य किलों की आवश्यकता है?”
प्रमुख बिंदु जो चर्चा में हैं:
- स्वायत्तता: इन भूमिगत शहरों के पास अपने बिजली जनरेटर और रसद आपूर्ति है।
- सुरक्षा: एक हिस्से पर हमले का असर दूसरे चैंबर पर नहीं पड़ता।
- रणनीति: नागरिक सुविधाओं की कीमत पर ‘सर्वाइवल’ को प्राथमिकता देना।
’मनोज कुमार मिश्र’
का यह विश्लेषण स्पष्ट करता है कि आधुनिक युद्ध केवल आसमान से नहीं, बल्कि जमीन की गहराइयों से भी लड़ा और जीता जा सकता है।
