कीर्तिमुख (कीर्ति + मुख) हिंदू धर्म में एक अत्यंत रहस्यमय और तांत्रिक प्रतीक
कीर्तिमुख (कीर्ति + मुख) हिंदू धर्म में एक अत्यंत रहस्यमय और तांत्रिक प्रतीक माना जाता है। यह मुख्यतः मंदिरों के द्वार, शिखर और तोरणों पर स्थापित किया जाता है। पुराणों के अनुसार यह भगवान शिव की उग्र शक्ति से उत्पन्न हुआ दिव्य रक्षक है, जिसे स्वयं शिव ने देवालयों का प्रहरी बना दिया।
पुराणों में वर्णन मिलता है कि एक समय असुर जालंधर ने भगवान शिव के पास अपना दूत राहु को भेजा। उस दूत ने शिव के समक्ष अत्यंत अहंकारपूर्ण वचन कहे। यह सुनकर शिव के भ्रूमध्य से एक अत्यंत भयानक और उग्र प्राणी प्रकट हुआ। वह इतना विकराल और भूखा था कि उसने राहु को ही भक्षण करने के लिए दौड़ लगा दी। भयभीत राहु ने शिव की शरण ली। शिव ने उस प्राणी को राहु को छोड़ने की आज्ञा दी।
परंतु वह प्राणी अत्यंत भूखा था। तब शिव ने उसे आदेश दिया कि वह अपने ही शरीर का भक्षण करे। शिव की आज्ञा का पालन करते हुए उसने अपने समस्त शरीर को खा लिया और अंत में केवल उसका मुख शेष रह गया। उसके अद्वितीय आज्ञापालन और भक्ति से प्रसन्न होकर शिव ने उसे “कीर्तिमुख” नाम दिया और वरदान दिया कि वह सदा मंदिरों के द्वार पर स्थित होकर देवालय की रक्षा करेगा।
इसी कारण प्राचीन मंदिरों के द्वारों और शिखरों के ऊपर जो उग्र मुख दिखाई देता है उसे कीर्तिमुख कहा जाता है। यह दुष्ट शक्तियों को दूर रखने वाला और देवालय की रक्षा करने वाला दिव्य प्रतीक माना जाता है।
इसका उल्लेख स्कन्द पुराण, शिव पुराण और पद्म पुराण में प्राप्त होता है। आगम शास्त्र और मंदिर वास्तुशास्त्र में भी कीर्तिमुख को देवालय का अनिवार्य रक्षक माना गया है।
तांत्रिक परंपरा में कीर्तिमुख को भैरव और शिव की उग्र शक्ति का प्रतीक माना जाता है। कई तांत्रिक और भैरव साधक इसे यंत्रों, मंदिरों और साधना स्थलों के प्रवेश द्वार पर स्थापित करते हैं ताकि नकारात्मक शक्तियां भीतर प्रवेश न कर सकें।
शास्त्रों में कीर्तिमुख की स्तुति का एक श्लोक भी कहा गया है
उग्रं मुखं महाघोरं सर्वभूतभयङ्करम्।
कीर्तिमुखं नमस्यामि रक्ष रक्ष नमोऽस्तु ते॥
अर्थात उस उग्र और अत्यंत भयानक मुख को नमस्कार है जो समस्त दुष्ट शक्तियों को भयभीत करता है। हे कीर्तिमुख, हमारी रक्षा करो।
