छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति और दंडकारण्य की माटी में मदनोत्सव

छत्तीसगढ़ में होली से पहले मनाया जाने वाला मदनोत्सव या वसंतोत्सव ऋतु, प्रेम और प्रकृति के महत्व को उद्घाटित करने वाला प्राचीन पर्व है। यह उत्सव वसंत पंचमी से प्रारंभ होकर होली तक लगभग चालीस रातों तक चलता है। इसे प्रेम के देवता कामदेव और उनकी पत्नी रति के सम्मिलित प्रेम को समर्पित किया जाता है।

मदनोत्सव का सांस्कृतिक और प्राकृतिक स्वरूप

माघ मास के अंत और वसंत ऋतु के आगमन के साथ पूरे दंडक अरण्य में पलाश के लाल फूलों की छटा फैल जाती है। यह ऐसा समय होता है जब जंगल जंगली फूलों की सुवास से महकने लगते हैं और हवा में एक नरम मद-पूरित वातावरण व्याप्त होता है। हिन्दू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह वही समय है जब कामदेवअपने धनुष और बाणों के साथ यौवन और सुकुमारता की शक्ति से भ्रमण करते हैं, और उनकी दृष्टि जिस हृदय पर पड़ती है, वह प्रेम और आकर्षण में मदहोश हो जाता है।

उत्सव का नाट्य और संगीत

मदनोत्सव के दौरान युवक-युवतियां जंगलों, घाटियों और गाँवों में एकत्र होकर रतिनृत्य और किसबिन का आयोजन करते थे। यह नृत्य केवल शारीरिक आनंद का माध्यम न होकर, मन और भावनाओं के जश्न का प्रतीक था। फूलों के बाण, हल्के पंच और मधुर गीतों के माध्यम से प्रेम और सौंदर्य का विस्तार किया जाता था। उत्सव में सूर्य की सुनहरी रोशनी, पलाश के लाल फूल और पेड़ों पर मंडराती कोयल की कुहू-कुहू की ध्वनि सभी एक अभूतपूर्व रोमांच और सौंदर्य का संगीत बनाते थे।

पौराणिक महत्व

ऋतु-संहार एवं धर्मशास्त्रों में इस समय को ‘प्रेम की ऋतु’ माना गया। वसंत पंचमी को ही कामदेव और रति ने मानव हृदय में प्रेम का बीज रोपा था। उनके धनुष के बाण केवल भौतिक नहीं, बल्कि भावनाओं, आकर्षण, सौंदर्य और प्राकृतिक हलचल के द्वारा प्रेम और यौवन का संचार करते थे।
मदनोत्सव को कभी-कभी चंद्रोत्सव के नाम से भी जाना गया, जिसमें चार्वाक समाज सहित अन्य प्राचीन संस्कृतियों ने प्रेम और मित्रता के मामलों का उत्सव मनाया।

आध्यात्मिक और शैक्षिक पहलू

वसंत पंचमी के साथ ही यह पर्व ज्ञानदेवी सरस्वती की पूजा से भी जुड़ा है। उत्सव का यह समय केवल प्रेम का नहीं बल्कि सृजनात्मक और बौद्धिक ऊर्जा का भी उद्गम है। यहाँ रचनात्मक कला, संगीत, साहित्य और नृत्य की गतिविधियां मनुष्य में यौवन, उत्साह और आध्यात्मिक जागरूकता लाती हैं।

छत्तीसगढ़ में पर्व मदनोत्सव जीवन, प्रेम, सौंदर्य और प्रकृति के सामंजस्य का प्रतीक है। यह केवल ऐतिहासिक या सांस्कृतिक उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति की नवीनीकरण और मानव हृदय में प्रेम की ऊर्जा का उत्सव है। युवा और प्रौढ़ सभी इसके माध्यम से जीवन में आनंद, रचनात्मकता और यौवन का अनुभव प्राप्त करते हैं।

छत्तीसगढ़ी संस्कृति में यह पर्व आज भी इतिहास और लोक-कथाओं के माध्यम से जीवित है, जो न केवल प्रकृति और ऋतु के महत्व को उजागर करता है, बल्कि मानव हृदय में प्रेम और सौंदर्य की अनुभूति को भी सशक्त बनाता है।

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