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21/03/2026

​ईरान में अभूतपूर्व नागरिक विद्रोह: क्या बदल रहा है इस्लामिक गणराज्य का चेहरा?

तेहरान/दुबई: मध्य पूर्व के सबसे शक्तिशाली देशों में से एक, ईरान, इस समय अपने इतिहास के सबसे बड़े सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव के दौर से गुजर रहा है। सड़कों पर उमड़ा जनसैलाब और गूंजते नारे केवल सरकार विरोधी नहीं हैं, बल्कि यह दशकों से चली आ रही एक विशेष व्यवस्था के खिलाफ गहरे असंतोष का प्रतीक बनकर उभरे हैं।

सड़कों पर आक्रोश: ‘आजादी’ की नई परिभाषा

​ईरान के बड़े शहरों—तेहरान, इस्फहान और शिराज—से आ रही खबरें और सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो एक नई कहानी बयां कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों द्वारा लगाए जा रहे नारों में एक स्पष्ट बदलाव देखा जा रहा है।

  • विदेशी नीति पर सवाल: “न गाजा, न लेबनान, मेरी जान सिर्फ ईरान” जैसे नारों के जरिए जनता हमास और अन्य बाहरी समूहों को दिए जाने वाले समर्थन का विरोध कर रही है।
  • धार्मिक सत्ता को चुनौती: प्रदर्शनों के दौरान धार्मिक नेतृत्व (मौलवियों) के खिलाफ तीखी बयानबाजी देखी गई है, जो ईरान जैसे देश में पहले अकल्पनीय थी।
  • प्रतीकों का विरोध: कई जगहों पर सरकारी इमारतों से धार्मिक और आधिकारिक झंडे हटाए जाने की खबरें सामने आई हैं, जो सीधे तौर पर शासन की वैधता को चुनौती दे रहे हैं।

अपनी जड़ों की ओर वापसी: ‘घर वापसी’ का रुझान

​ईरान के युवाओं और मध्यम वर्ग के एक बड़े हिस्से में अपने इस्लाम-पूर्व गौरवशाली इतिहास (पारसी/जोरोस्ट्रियन धर्म) के प्रति लगाव तेजी से बढ़ा है। लोग अग्नि देव (Fire Worshipers) और प्राचीन फारसी सभ्यता को अपनी पहचान का मूल आधार मान रहे हैं।

​”यह केवल राजनीतिक बदलाव की मांग नहीं है, बल्कि एक सांस्कृतिक पहचान की तलाश है। ईरानी युवा अपनी उस विरासत को गले लगाना चाहते हैं जो सदियों पुरानी है।” — क्षेत्रीय विश्लेषक

 

क्या शासन के लिए ‘खतरे की घंटी’ है?

​विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार का आंदोलन पहले के आंदोलनों से अलग है क्योंकि:

  1. व्यापक जनभागीदारी: इसमें केवल छात्र ही नहीं, बल्कि मजदूर, व्यापारी और महिलाएं भी शामिल हैं।
  2. धार्मिक कट्टरता का अंत: जनता के एक हिस्से में धर्म और राजनीति के अलगाव (Secularism) की मांग प्रबल हुई है।
  3. इजरायल के प्रति नजरिया: आधिकारिक दुश्मनी के बावजूद, प्रदर्शनों में इजरायल को ‘दुश्मन’ मानने से इनकार करने वाले स्वर भी सुनाई दिए हैं।

​ईरान आज एक दोराहे पर खड़ा है। एक तरफ कट्टरपंथी सत्ता है और दूसरी तरफ अपनी पहचान और आजादी के लिए लड़ती जनता। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह ‘ज्वाला’ किसी बड़े सत्ता परिवर्तन का कारण बनती है या शासन इसे बलपूर्वक दबाने में सफल रहता है।

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